उर्दू गजल को नई पहचान दिलाने वाले प्रख्यात राष्ट्रवादी शायर पद्मश्री से सम्मानित डॉक्टर बशीर बद्र का उत्तराखंड की सरजमीं रुड़की से रहा विशेष लगाव,,,

उर्दू गजल को नई पहचान दिलाने वाले प्रख्यात राष्ट्रवादी शायर पद्मश्री से सम्मानित डॉक्टर बशीर बद्र का उत्तराखंड की सरजमीं रुड़की से रहा विशेष लगाव,,,

उर्दू गजल को नई पहचान दिलाने वाले प्रख्यात राष्ट्रवादी शायर पद्मश्री से सम्मानित डॉक्टर बशीर बद्र का उत्तराखंड की सरजमीं रुड़की से रहा विशेष लगाव,,,
रुड़की।
उर्दू गजल को पूरे विश्व में नई पहचान दिलाने वाले राष्ट्रवादी शायर पद्मश्री डॉक्टर बशीर बद्र का गत दिवस भोपाल में देहांत हो गया था,जिसपर देश-विदेश में उनके लिए संवेदना प्रकट की जा रही है।डॉक्टर बशीर बद्र का उत्तराखंड के रुड़की,मंगलौर,कलियर,हरिद्वार व देहरादून से गहरा लगाव रहा और वह अनेक बार रुड़की,मंगलौर,कलियर,देहरादून व हरिद्वार में प्रस्तुति देने आए।रुड़की से जुड़ी उनकी अनेक यादों को लोग भूले नहीं है।उत्तराखंड उर्दू अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष और अंतर्राष्ट्रीय शायर अफजल मंगलौरी ने बताया कि डॉक्टर बशीर बद्र जब मेरठ विश्वविद्यालय में उर्दू के विभाग के अध्यक्ष थे,तब वे बीएम डिग्री कॉलेज रुड़की में बीए के छात्र थे और कॉलेज की ओर से अंतर विश्वविद्यालय कविता प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए मेरठ जाया करते थे,जिसमें जज के तौर पर डॉक्टर बशीर बद्र व डाक्टर कुंवर बेचैन जैसे देश के बड़े कवि इन प्रतियोगिताओं के जज के तौर पर शामिल रहते थे।अफजल मंगलौरी ने बताया की डॉक्टर बशीर बद्र मेरठ के शास्त्री नगर में रहते थे और 1987 में मेरठ में सांप्रदायिक दंगे के दौरान उनका घर जला दिया गया था,जिस पर उन्होंने कई गजलें कही थी,जिसका एक शेर बहुत मशहूर हुआ था कि “लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में” और उनका दूसरा शेर-“बड़े शौक से मेरा घर जला,कोई आंच तुझ पर ना आएगी!ये जुबा किसी ने खरीद ली,ये कलम किसी की गुलाम है”
इस घटना से डॉक्टर बशीर बद्र बहुत दुखी हुए और उन्होंने मेरठ छोड़ने का फैसला किया,इसी दौरान उन्होंने भोपाल की श्रीमती राहत बदर से दूसरा विवाह किया,क्योंकि उनकी पहली पत्नी का स्वर्गवास हो चुका था।शादी के बाद उनके पहली पत्नी के पुत्रों ने उनके साथ अच्छा बर्ताव नहीं किया और वह दुखी होकर भोपाल जाने के लिए तैयार हो गए,जहां उनकी पत्नी राहत बदर का मायका था।इसी दौरान सन् 1988 में अफजल मंगलौरी की भेंट मेरठ में डॉक्टर बशीर बदर से हुई और उन्होंने उनको रुड़की आने की दावत दी तथा कुछ दिन रुड़की में रुकने का न्यौता भी दिया।डॉक्टर बशीर बद्र ने अफजल मंगलौरी के निमंत्रण को स्वीकार करते हुए 26 जून 1988 को रुड़की में आने का समय दिया,जिस के फलस्वरूप उनके सम्मान मे “एक शाम-बशीर बद्र के नाम” कार्यक्रम रुड़की नगर पालिका हाल में आयोजित किया गया।इस भव्य समारोह में इलाहाबाद हाईकोर्ट के तत्कालीन जज जस्टिस एसआई जाफरी और तत्कालीन केंद्रीय पेट्रोलियम व गैस उप-मंत्री रफीक आलम ने विशेष रूप से भाग लेकर डाक्टर बशीर बद्र को राष्ट्रीय एकता सम्मान से नवाजा।इस कार्यक्रम से डॉक्टर बशीर बद्र बहुत प्रसन्न हुए और रुड़की के प्रसिद्ध होटल पोलरिस के मैनेजर राजबहादुर सिंह,जो कार्यक्रम के संरक्षक थे से उनकी दोस्ती हो गई और लगभग दस दिनों तक वे रुड़की में रहे।इसी दौरान उन्होंने कलियर शरीफ,हरिद्वार व मंगलौर में कई कार्यक्रम दिए।मंगलौर के विधायक काजी निजामुद्दीन के पिता तत्कालीन कैबिनेट मंत्री काजी मोहिउद्दीन के निवास पर भी कई दिनों तक उनका कयाम रहा और शायरी की महफिलें सजती रही।इसके बाद अफजल मंगलौरी के अनुसार मैंगलोर के बाद बीएसएम डिग्री कॉलेज में पंडित मनोहर लाल शर्मा की अध्यक्षता में 1998 में उन्होंने बड़ा मुशायरा आयोजित किया,जिसमें डॉक्टर बशीर बद्र ने विशेष रूप से भाग लिया,इसके अलावा कई बार देहरादून,हरिद्वार,मंगलौर,रुड़की में काव्यपाठ के लिए आये।पूर्व कुलपति प्रोफेसर वहीदुद्दीन मलिक व पूर्व जनसम्पर्क अधिकारी डॉ०मधुर जी के निवास सोलानीपुरम में भी डाक्टर बशीर बद्र अनेक बार रुके और शायरी की मेहफिलें सजती रही।सन् 2000 में दोहा,कतर और दुबई में जश्ने बशीर बद्र में अफजल मंगलौरी को उत्तरांचल बनने पर बधाई देते हुए उनको बशीर बद्र ने दुबई और कतर बुलाया था।अफजल मंगलौरी ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि यह बड़े दुख का विषय है कि पद्मश्री व साहित्य अकादमी जैसे अनेक राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार अपने वाले डॉक्टर बशीर बद्र के निधन पर कोई शासकीय सम्मान सरकार द्वारा नहीं दिया गया,साथ ही यह भी अफसोस का विषय है कि भोपाल में कई सौ की तादाद में हिंदी,उर्दू के साहित्यकार विद्यमान हैं,लेकिन डॉक्टर बशीर बद्र की अंतिम यात्रा में केवल चंद गिने चुने लोग ही शामिल हुए,क्योंकि डॉक्टर बशीर बद्र दस सालों से कोमा की स्थिति में थे,इसलिए आज के स्वार्थी समाज के लोगों व सत्ता प्रेमी चाटुकारों ने उनको कंधा तक नहीं दिया और रात के अंधेरे में उनको दफन कर दिया गया,जो भोपाल वासियों के मुँह पर तमाचा है।

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