दरगाह साबिर पाक की मजार—जो आस्था, अमन और भाईचारे का प्रतीक मानी जाती है—आज शरारती/मनचलों और हुड़दंगियों की बनी पनाहगाह,,,
पिरान कलियर:
जहां दुआओं की सरगोशियां, चादरों की खुशबू और रूहानी सुकून की फिज़ा महसूस होती है, वही पवित्र दरगाह आज कुछ असामाजिक तत्वों की वजह से हुड़दंग, मारपीट और अराजकता का अखाड़ा बनती नज़र आ रही है। उत्तराखंड के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शुमार, विश्व प्रसिद्ध दरगाह हज़रत अलाउद्दीन अली अहमद साबिर पाक की मजार—जो आस्था, अमन और भाईचारे का प्रतीक मानी जाती है—आज शरारती/मनचलों और हुड़दंगियों की पनाहगाह बनती दिखाई दे रही है।
दूर-दराज़ से रोज़ाना सैकड़ों अकीदतमंद और श्रद्धालु परिवार के साथ यहां मन्नतें और मुरादें लेकर हाज़िर होते हैं। मगर अफसोस, इन पाक इरादों के बीच कुछ शरारती और नशेड़ी तत्व दरगाह की पाकीज़गी को लगातार तार-तार करने में लगे हैं। आए दिन दरगाह परिसर में मारपीट, गाली-गलौच और हुड़दंग की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं, जो न सिर्फ दरगाह की गरिमा को ठेस पहुंचा रही हैं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर रही हैं।
ताज़ा मामला शुक्रवार, जुमे की नमाज़ के बाद का बताया जा रहा है, जब दरगाह परिसर में कुछ असामाजिक तत्वों के बीच कहासुनी ने मारपीट का रूप ले लिया। इस शर्मनाक घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है। वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि किस तरह दरगाह परिसर—जो इबादत और सुकून की जगह है—अराजकता का अखाड़ा बना हुआ है।
आस्थावान लोगों का कहना है कि हालात यहां तक बिगड़ चुके हैं कि दरगाह में आने वाली महिलाओं और लड़कियों से छेड़छाड़ जैसी शिकायतें भी सामने आती रही हैं। नशे में धुत कुछ लोग खुलेआम उत्पात मचाते हैं, लेकिन हैरत की बात ये है कि दरगाह के भीतर और आसपास तैनात सुरक्षाकर्मी, कर्मचारी और पीआरडी जवान सब कुछ देख कर भी अनदेखा कर देते हैं। सवाल ये है कि क्या इनकी ड्यूटी सिर्फ तनख्वाह लेने तक सीमित रह गई है..?
विडंबना इससे बड़ी क्या होगी कि दरगाह परिसर में सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए बाकायदा कर्मचारी और पीआरडी जवान तैनात हैं, जिन्हें हर महीने मोटी तनख्वाह दी जाती है, लेकिन इसके बावजूद दरगाह परिसर बार-बार झगड़े और मारपीट का केंद्र बनता जा रहा है। यह कोई पहला मामला नहीं है—इससे पहले भी कई बार दरगाह परिसर में हुई मारपीट के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो चुके हैं, मगर आज तक न तो किसी की जवाबदेही तय हुई और न ही कोई ठोस कार्रवाई सामने आई।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इन घटनाओं के बावजूद दरगाह प्रशासन की चुप्पी लगातार बनी हुई है। न कोई सख्त कदम, न कोई उदाहरणात्मक कार्रवाई—बस मूकदर्शक बने रहना, जैसे सब कुछ सामान्य हो। सवाल ये है कि क्या आस्था की इस पवित्र धरती को यूं ही असामाजिक तत्वों के हवाले छोड़ दिया जाएगा? या फिर कभी दरगाह की गरिमा, श्रद्धालुओं की सुरक्षा और अमन-चैन की बहाली के लिए कोई ठोस कदम उठाया जाएगा..?

