नालों पर अवैध अतिक्रमण के कारण मूसलाधार बारिश ने दरगाह प्रबंधन, नगर पंचायत और प्रशासनिक दावों की एक बार फिर खोलकर रख दी कलई,,,
दरगाह का पहाड़ी गेट हो या दरगाह के दूसरे गेट या फिर फुआरा चौक सब पर अवैध अतिक्रमण कर दुकानदारों ने किये हुवे है नाले चौक,,,
कलियर;
अनवर राणा।
पिरान कलियर में यूपी सिंचाई विभाग की सरकारी जमीन पर अवैध अतिक्रमण हो या सरकारी सीलिंग व नगर पंचायत की जमीनों सहित दरगाह की जमीन पर भी अवैध अतिक्रमण के कारण जल निकासी न होने से दरगाह की पवित्रता प्रतिवर्ष बरसात में भंग होती है लेकिन स्थानीय जनप्रतिनिधि अपने वोट बैंक की खातिर कुछ भी कार्यवाही कराने से बचते है इसलिये यहां जलनिकासी न होने से दरगाह के अंदर गटर का गन्दा पानी हर वर्ष भरता है तो भरने दो लेकिन इन जनप्रतिनिधियों के पिठ्ठियो की पक्की दुकानों के सामने जो नाले बनवाये गये थे उनको खुलवाने की जहमत नगर पंचायत प्रतिनिधि व अधिकारी नहीं उठा रहे है ओर निरीक्षण के नाम पर लीपापोती कर जनता को व श्रद्धालुओ को बेवकूफ बनाया जा रहा है।
“जहां सज्दे होते हैं, वहां अगर पानी का सैलाब हो जाए तो सवाल सिर्फ बारिश का नहीं, बल्कि इंतज़ामिया की नाकामी का भी होता है। “विश्व प्रसिद्ध पिरान कलियर शरीफ में बरसात के साथ जलभराव कोई नई कहानी नहीं है। हर साल बारिश आती है, दरगाह परिसर तालाब बन जाता है, स्थानीय लोग अपनी आस्था बचाने के लिए घंटों मशक्कत करते हैं और जिम्मेदार विभाग अगले साल फिर वही दावे दोहराने लगते हैं। इस बार भी बुधवार रात से हुई मूसलाधार बारिश ने दरगाह प्रबंधन, नगर पंचायत और प्रशासनिक दावों की एक बार फिर कलई खोलकर रख दी। कहते हैं “वक्त जब आईना दिखाता है, तब दावे नहीं, हकीकत नज़र आती है।”
विश्व प्रसिद्ध दरगाह साबिर पाक, जहां हर वर्ष लाखों जायरीन और अकीदतमंद अपनी हाज़िरी लगाने पहुंचते हैं, वहीं बरसात की पहली ही रात पूरा दरगाह परिसर पानी में डूब गया। चारों ओर ऐसा मंजर था मानो दरगाह परिसर किसी तालाब का रूप ले चुका हो। गुलाम गर्दिश तक बारिश का पानी पहुंच गया, जिसके बाद स्थानीय लोगों ने अपनी आस्था की हिफाज़त के लिए मोर्चा संभाल लिया।
सुबह तड़के से लेकर कई घंटों तक स्थानीय लोग बारिश के पानी को दरगाह के मुख्य स्थान तक पहुंचने से रोकने के लिए मशक्कत करते रहे। अंदर जमा पानी को बाहर निकालने के प्रयास किए गए। विडंबना यह रही कि जिस व्यवस्था की जिम्मेदारी दरगाह प्रबंधन और संबंधित विभागों पर है, वह जिम्मेदारी एक बार फिर स्थानीय लोगों के कंधों पर आ गई।
हैरानी की बात यह है कि यह पहला मौका नहीं है। लगभग कई साल से बरसात में यही हालात सामने आते हैं। इसके बावजूद न तो जल निकासी की स्थायी व्यवस्था बनाई गई और न ही नालों की सफाई को लेकर कोई प्रभावी योजना धरातल पर उतरती दिखाई दी। हर बार बारिश के बाद अधिकारी निरीक्षण करते हैं, दावे होते हैं, बैठकें होती हैं, लेकिन कुछ समय बाद सारी बातें फाइलों में दफन होकर रह जाती हैं।
बरसात की पहली बारिश ने दरगाह प्रबंधन तंत्र और नगर पंचायत के उन तमाम दावों की पोल खोल दी, जिनमें जलभराव से निजात और साफ-सफाई के बड़े-बड़े वादे किए जाते रहे हैं। नाले-नालियां उफान पर थीं, सड़कें पानी में डूबी थीं और दरगाह परिसर भी इससे अछूता नहीं रह सका।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि दरगाह के पास सौ करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि उपलब्ध होने के बावजूद व्यवस्थाओं में अपेक्षित सुधार दिखाई नहीं देता। अकीदतमंदों का कहना है कि करोड़ों रुपये होने के बावजूद यदि बारिश का पानी दरगाह परिसर तक पहुंच जाए तो यह केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि व्यवस्थागत विफलता का प्रमाण है।
लोगों का यह भी आरोप है कि नालों की सफाई के नाम पर हर वर्ष बजट खर्च होने के दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत पहली ही बारिश में सामने आ जाती है। सवाल उठ रहे हैं कि आखिर सफाई के नाम पर खर्च होने वाला पैसा जाता कहां है? यदि नियमित सफाई होती है तो फिर हर साल वही जलभराव क्यों होता है?
एक और बड़ा सवाल नगर पंचायत की भूमिका को लेकर भी उठ रहा है। नगर पंचायत दरगाह क्षेत्र के कई हिस्सों पर अपना अधिकार और जिम्मेदारी जताती है, लेकिन जब बात दरगाह परिसर की मूलभूत सुविधाओं और जल निकासी व्यवस्था की आती है तो जिम्मेदारियां से पल्ला झाड़ लिया जाता है। आखिर इस संवेदनशील धार्मिक स्थल की जवाबदेही किसकी है?
अकीदतमंदों का कहना है कि लाखों लोगों की आस्था से जुड़े इस पवित्र स्थल को हर साल ऐसी बदहाली का सामना क्यों करना पड़ता है? क्या जिम्मेदार अधिकारी केवल निरीक्षण, बयान और आश्वासन देने तक सीमित रहेंगे, या फिर कभी ऐसी ठोस योजना भी बनेगी जिससे बरसात में दरगाह परिसर को जलभराव से स्थायी राहत मिल सके?
इन हालातों पर एक मशहूर कहावत याद आती है— “कागज़ों पर बने पुल और भाषणों में किए गए वादे, पहली बारिश में बह जाते हैं। बहरहाल “अब निगाहें प्रशासन, दरगाह प्रबंधन और नगर पंचायत पर टिकी हैं। सवाल सिर्फ पानी भरने का नहीं, बल्कि उस भरोसे का भी है जो लाखों अकीदतमंद इस पवित्र दरगाह से जोड़कर रखते हैं। यदि करोड़ों की संपत्ति और बड़े-बड़े दावों के बावजूद आस्था का केंद्र हर साल पानी में डूबता रहेगा, तो फिर जवाबदेही तय कौन करेगा?

